Metronomial disputes are very sensitive matters. These should be treated with great care otherwise it becomes very fatal for both the parties. In such cases, children are the victims of the most atrocities in the fight for the ego of their parents.
बच्चों के कानूनी अधिकार
पिछले दिनों पिछले अंक में महिलाओं के संबंध में कानूनी अधिकारों के बारे में चर्चा की गई थी जिस पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई और बच्चों के संबंध में कानूनी अधिकार तथा बच्चों पर होने वाले अत्याचारों के बारे में प्रश्न किए गए जिनका उत्तर इस अंक में देने का प्रयास किया गया है। बच्चे स्वभाव से निर्मल होते हैं तथा भारत में बच्चों को भगवान का स्वरूप भी माना जाता है किंतु आज दुर्भाग्य यह है कि छोटे-छोटे बच्चे भी अपराध का शिकार हो रहे हैं या छोटे-छोटे बच्चों को अपराध में धकेला जा रहा है । बच्चों के ऊपर अत्याचार किए जाने की घटनाएं आए दिन देखने और सुनने को मिल रही हैं आइए देखते हैं इस संबंध में बच्चों को लेकर कानून में क्या प्रावधान है बच्चों पर होने वाले अत्याचारों के संबंध में या बच्चों के द्वारा किए जा रहे अपराधों के संबंध में कानून क्या कहता है :-
वर्तमान में बच्चों पर कई प्रकार के अत्याचार देखने में आ रहे हैं कुछ अत्याचार घरेलू अत्याचारों की श्रेणी में है कुछ अत्याचार गंभीर किस्म के अत्याचार हैं । प्रायः सौतेली मा द्वारा छोटे बच्चों पर अत्याचार किए जाते हैं, पिता शराब के नशे में बच्चों पर अत्याचार करता है, कोई बाल श्रमिक बनाकर अत्याचार करता है, छोटी बच्चियों को वेश्यावृत्ति के लिए चुरा लिया जाता है,कोई लंगड़ा लूला अंधा करके अत्याचार करता है और भिक्षा वृत्ति कराता है, कोई बच्चों के साथ यौन अपराध करता है ऐसे कई तरह के अपराध देखने सुनने में आ रहे हैं। यौन अपराधें से बच्चों की सुरक्षा अध्नियम 2012 पोक्सो एक्ट एक विशेष कानून है जो बच्चों के साथ किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के यौनकृत्यों को अपराध् के दायरे में लाता है। इस कानून में विशेष अदालतों की स्थापना और अपनायी जाने वाली न्याय प्रक्रिया से संबंधित प्रावधन है।इसके अलावा जिन बच्चों को देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता है या जिन्होंने कानून का उल्लंघन किया है, वैसे बच्चों के लिए किशोर न्याय ;देखरेख और संरक्षण अध्नियम एक महत्त्वपूर्ण कानून है। इस कानून में बच्चों की देखरेख, संरक्षण, विकास, बर्ताव, समाज के साथ उनका दुबारा जुड़ाव और पुनर्वास से संबंधित प्रावधान हैं। इन प्रावधानों में बच्चों के प्रति मित्रवत दृष्टिकोण अपनाया गया है।
भारतीय दंड संहिता के अनुसार 7 साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया कोई भी आपराधिक कार्य को अपराध नहीं माना जाएगा। इसके अलावा 18 वर्षों से कम उम्र के बच्चों के द्वारा किया गया कार्य भी इस प्रकार का नहीं माना जाएगा की उसने ऐसा कोई कार्य आपराधिक इरादे से किया है । इसके लिए बाल न्यायालयों की स्थापना की गई है जहां उन्हें सामान्य वातावरण में न्याय दिलाने की व्यवस्था की जाती है । यदि कोई बच्चा किसी कारण से अपराधी प्रतीत होता है तो उसे सुधार ग्रह में रखने की सलाह दी जाती है। जब भी कोई बच्चा चाहे उसने कोई अपराध किया हो या वह स्वयं किसी अपराध का शिकार हुआ हो दोनों ही अवस्था में पुलिस उसके साथ एक गरिमामय व्यवहार करेगी और उसके बाल मन पर विपरीत असर ना होवे वैसा बर्ताव करेगी। पुलिस बच्चे की बात को ध्यान पूर्वक सुनकर उसकी इच्छाओं का सम्मान करेगी यदि बच्चा पुलिस के साथ बातचीत करना नहीं चाहता है या पुलिस से भयभीत हो रहा है तो ऐसी दशा में किसी सामाजिक संस्था या महिला पुलिस या एक युक्तियुक्त तरीके से बच्चे के साथ व्यवहार करेगी। यदि मानव तस्करी का मामला है या अन्य किसी प्रकार का मामला है और बच्चा बार-बार घटनाओं को अलग अलग तरीके से बताता है या ठीक से याद नहीं कर पा रहा है तो इसका अर्थ उसके द्वारा की गई गलत बयानी नहीं समझा जावेगा। यदि कोई बच्चा किसी अपराध में लिप्त है या किसी बड़े व्यक्ति के द्वारा उससे कोई अपराध करवाया जा रहा है तो ऐसी दशा में वह बच्चा अपराधी ना माना जावेगा बल्कि वह व्यक्ति अपराधी माना जावेगा जिसके संरक्षण में ऐसा बच्चा कोई अपराध कर रहा है।
यदि पुलिस को कोई बाल अपराधी मिलता है या कोई अनाथ बाल अपराधी मिलता है तो पुलिस की जिम्मेदारी रहेगी कि वह ऐसे बच्चों को उचित आश्रय तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य की व्यवस्था कराने हेतु समस्त आवश्यक उपाय करें। ऐसे बच्चे की मानसिक परिस्थिति उसके शारीरिक स्वास्थ्य के आधार पर तथा उसकी रुचि के आधार पर उसे उचित आवास में भेजे जाने का प्रबंध करेगी। बच्चों के साथ व्यवहार करते समय पुलिस कभी भी किसी भी प्रकार का कोई गाली गलौज या चरित्र हनन संबंधी बातें या अनैतिक बातें नहीं करेगी। यहां तक कि किसी वेश्यालय में कार्य करने वाली किसी बच्ची को यदि उस वेश्यालय से मुक्त कराया जाता है तो भी उसे कहीं भी वेश्या शब्द से उल्लेख नहीं किया जावेगा उसे पूर्ण आदर व सम्मान के साथ संबोधित किया जावेगा। इसी प्रकार किसी भी बच्चे के साथ उसके जाति लिंग नस्ल आकृति आदि के आधार पर किसी भी प्रकार से कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और ना ही किसी प्रकार की कोई विपरीत टिप्पणी की जावेगी। यथासंभव किसी बच्चे के द्वारा कोई अपराध किया जाने पर या अपराध से पीड़ित हो जाने पर उसके नाम का अनावश्यक प्रचार नहीं किया जावेगा। बच्चों के संबंध में निर्णय लेने के लिए महिला एवं बाल विकास अधिकारी तथा सामाजिक संगठनों का सहयोग लिया जावेगा। किशोर न्याय आदर्श नियम, 2016 के नियम 93 में यह प्रावधन किया गया है कि यदि किसी अधिकारी, संगठन या कानूनी संस्था, इत्यादि, द्वारा बच्चों के संबंध में कानून अथवा नियमों का अनुपालन नहीं किया जाता है तो राज्य सरकार ऐसे अधिकारी,संगठन या कानूनी संस्था इत्यादि के विरुद्ध जाँच के बाद कारवाई कर सकती है। इसके साथ-साथ उस अधिकारी, संगठन या कानूनी संस्था के दायित्वों का निर्वहन करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी, ताकि कानून को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। अनाथ बच्चों के लिए जिले का कलेक्टर पदेन संरक्षक होता है किसी भी अनाथ बच्चे के लिए समुचित व्यवस्था करने का दायित्व संबंधित जिले के कलेक्टर का होता है।
शासन द्वारा ग्राम स्तर पर, ब्लॉक स्तर पर तथा नगरपालिका स्तर पर बाल संरक्षण समिति की स्थापना करने के प्रावधान निर्मित किए गए हैं। वार्ड स्तर पर भी बाल संरक्षण के लिए व्यवस्था की गई है जिसकी जिम्मेदारियां आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दी गई हैं।
इसमें संबंधित अधिकारी व कार्यकर्ताओं को यह जिम्मेदारी दी गई है कि उन्हें किसी भी प्रकार के शोषण से पीड़ित बच्चे को देखते ही आपकी प्रतिक्रिया निम्नानुसार होनी चाहिए-
बच्चे से बात करने की कोशिश करेंगे एवं बच्चे को स्वस्थ माहौल में रखा जाना सुनिश्चित करेंगे।बच्चे के परिवार से बात कर उन्हें यह समझायेंगे कि सभी बच्चों के मानव अधिकार होते हैं, और माता-पिता के रूप में उनका प्राथमिक कर्तव्य बच्चे के अधिकारों की सुरक्षा करना है। बच्चे और परिवार की आवश्यकतानुसार सहायता करेंगे। बच्चे की सुरक्षा पर खतरे का पता लगायेंगे। बच्चे के प्रति क्रूरता करने वाले के विरूद्ध कार्यवाही करेंगे और बच्चे को सुरक्षित करेंगे। बालक कल्याण समिति, चाईल्डलाइन व अन्य वैधानिक इकाईयों की सहायता लेते हुए बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। बाल संरक्षण हेतु बाल संरक्षण समिति के सदस्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि सभी बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा हो।
भारतीय संविधान-
भारतीय संविधान सभी बच्चों को कुछ खास अधिकार प्रदान करता है। ये खासतौर से उनको ध्यान में रखकर ही बनाए गए हैं। इन अधिकारों में निम्नलिखित शामिल हैं :-
1. 6-14 वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार है। (अनुच्छेद 21 ए)
2. 14 वर्ष की उम्र तक सभी बच्चों को किसी भी खतरनाक रोजगार/काम से सुरक्षा का अधिकार है।
(अनुच्छेद 24)
3. उन्हें दुर्व्यवहार से बचने और गरीबी के कारण अपनी ताकत से ज्यादा बड़े काम करने की मजबूरी से बचने का
अधिकार है। (अनुच्छेद 39 ई)
4. बच्चों को सही ढंग से पालन-पोषण और आजादी व सम्मान के साथ बराबर अवसर व सुविधाएं पाने का
अधिकार है। संविधान में बचपन और युवावस्था को शोषण तथा नैतिक व भौतिक लाचारी/बेसहारेपन से
सुरक्षा का भी आश्वासन दिया गया है। (अनुच्छेद 39 एफ)
इनके अलावा बच्चों को वे सारे अधिकार भी मिलते हैं जो भारत का नागरिक होने के नाते किसी भी
बालिग स्त्री-पुरूष को दिए गए हैं –
समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14)
भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 15)
व्यक्तिगत स्वतंत्रता व कानूनी प्रक्रिया का अधिकार (अनुच्छेद 21)
बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर न किए जाने और मानव व्यापार से सुरक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 23)
समाज के कमजोर तबकों को सामाजिक अन्याय और किसी भी तरह के शोषण से सुरक्षा का अधिकार
(अनुच्छेद 46)
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह-
बच्चों व औरतों के लिए विशेष प्रावधान करे। (अनुच्छेद 15 (3))
अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करे। (अनुच्छेद 29)
समाज के कमजोर वर्गा के शैक्षणिक हितों को बढ़ावा दे। (अनुच्छेद 46)
लोगों के पोषण तथा जीवनस्तर में सुधार लाए तथा उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखें। (अनुच्छेद 47)
अगर आप अपने गाँव/नगर में बच्चों को सुरक्षा देना चाहते हैं तो आपको निम्नांकित सभी लोगों के साथ संपर्क कर सकते हैं –
• महिला एवं बाल विकास अधिकारी
– बाल कल्याण समिति।
– राज्य एवं जिला स्तरीय बाल संरक्षण समिति।
– राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग।
– स्थानीय शासकीय विभागों के अधिकारी।
– चाइल्ड लाईन।
– विशेष किशोर पुलिस इकाई।
– पंचायत/स्थानीय निकाय।
– शिक्षक/आंगनबाड़ी कार्यकर्ता/एएनएम।
– स्थानीय पुलिस
– बच्चों के हितों में कार्य करने वाली सामाजिक संस्था
वस्तुतः यह विषय बहुत बड़ा है फिर भी संक्षेप में बहुत कुछ लिखने का प्रयास किया है आशा है यह पाठक के लिए उपयोगी सिद्ध होगा ।
Legal Rights of Children
Recently in the previous issue, there was a discussion about legal rights in relation to women, on which some readers’ responses were received and questions were raised regarding legal rights in relation to children and atrocities on children, which were answered in this issue. Tried to give. Children are pure by nature and in India, children are also considered as the form of God, but today the misfortune is that even small children are becoming victims of crime or small children are being pushed into crime. Incidents of atrocities on children are being seen and heard every day, let us see what is the provision in the law regarding children in relation to atrocities on children or crimes committed by children. What does the law say :-
At present, many types of atrocities on children are being seen, some atrocities are in the category of domestic atrocities, some atrocities are serious types of atrocities. Often small children are tortured by step mother, father tortures children under the influence of alcohol, someone tortures them by making them child labor, little girls are stolen for prostitution, someone blinds a lame child and tortures them. And begging, someone commits sexual crimes with children, many such crimes are being seen and heard. Protection of Children from Sexual Offenses Act 2012 The POCSO Act is a special law that criminalizes various types of sexual acts done with children. The law provides for the setting up of special courts and the judicial process to be followed. In addition, the Juvenile Justice (Care and Protection) Act is an important provision for children who are in need of care and protection or who have been in conflict with the law. There is law. The Act has provisions relating to the care, protection, development, treatment, reintegration and rehabilitation of children. A child friendly approach has been adopted in these provisions.